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बच्चों को मोबाइल की लत से बचाने के लिए पाठ्यक्रम में जोड़ा जाएगा मोबाइल के दुष्प्रभावों का पाठ..

Admin by Admin
2025-07-08
in उत्तराखंड
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बच्चों को मोबाइल की लत से बचाने के लिए पाठ्यक्रम में जोड़ा जाएगा मोबाइल के दुष्प्रभावों का पाठ..
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बच्चों को मोबाइल की लत से बचाने के लिए पाठ्यक्रम में जोड़ा जाएगा मोबाइल के दुष्प्रभावों का पाठ..

 

 

उत्तराखंड: राज्य में लगातार बढ़ती मोबाइल की लत अब स्कूली बच्चों के लिए चिंता का कारण बन गई है। बच्चे किताबों से अधिक समय मोबाइल स्क्रीन पर बिता रहे हैं, जिससे उनके मानसिक, शारीरिक और सामाजिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। इस चुनौती को देखते हुए अब उत्तराखंड सरकार स्कूलों में मोबाइल के दुष्प्रभावों पर आधारित पाठ शुरू करने जा रही है। शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने कहा कि मोबाइल के दुरुपयोग और इसके नकारात्मक प्रभावों से बच्चों को जागरूक करने के लिए इसे स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा। इसके साथ ही शिक्षा विभाग द्वारा एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) भी तैयार की जा रही है, जिसे सभी स्कूलों में लागू किया जाएगा। शिक्षा मंत्री का कहना हैं कि बच्चों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य सर्वोपरि है। हम उन्हें मोबाइल के सही उपयोग और इसके नुकसान के बारे में जागरूक करना चाहते हैं। यह पहल न केवल शिक्षा का हिस्सा होगी, बल्कि एक सामाजिक सुधार की दिशा में भी कदम होगा

उत्तराखंड के शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने कहा कि मोबाइल का अत्यधिक उपयोग बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। इसको देखते हुए, अब स्कूलों में एक एसओपी (मानक संचालन प्रक्रिया) जारी की जाएगी, जिसमें छात्रों को बताया जाएगा कि मोबाइल कितनी देर तक इस्तेमाल करें और ज्यादा समय देखने से क्या नुकसान हो सकते हैं। शिक्षा मंत्री ने कहा कि बच्चे घर पर मोबाइल पर अत्यधिक समय बिता रहे हैं, जिससे नेत्रों की समस्या, मानसिक तनाव, नींद में कमी और सामाजिक अलगाव जैसे दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं। छात्रों को पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से भी मोबाइल की आदत, उसके लाभ और हानियों के बारे में जानकारी दी जाएगी, जिससे उनमें स्वानुशासन और डिजिटल जागरूकता विकसित हो सके। सरकारी स्कूलों में 12वीं कक्षा तक छात्रों को मोबाइल लाने की अनुमति नहीं है, फिर भी यह देखा गया है कि बच्चे घर पर लंबे समय तक मोबाइल का उपयोग कर रहे हैं। सरकार अब इस पर अंकुश लगाने के लिए शिक्षा और परामर्श दोनों स्तरों पर कार्रवाई करेगी।

वहीं, छोटे बच्चों के रोते ही अभिभावक भी उन्हें मोबाइल पकड़ा देते हैं। शिक्षा मंत्री के मुताबिक कई विकसित देशों ने मोबाइल को लेकर एसओपी जारी की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शिक्षा मंत्री की बैठक में घर में नो मोबाइल जोन बनाने व उन्हें इसके नुकसान के बारे में बताने को कहा है। शिक्षा विभाग के अधिकारी बताते हैं कि मोबाइल फोन के कारण ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाता है। छात्र पढ़ाई शुरू करते हैं, लेकिन संदेशों, गेम या सोशल मीडिया के कारण उनका ध्यान भटकता है। इसके अलावा सोने से पहले मोबाइल देखते रहने से छात्रों के लिए सोना मुश्किल हो जाता है। इससे थकान, आलस्य और अगले दिन कक्षा में ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई होती है। कुछ छात्र यदि अपने फोन के इस्तेमाल का मौका नहीं पाते हैं तो वे चिंतित या चिड़चिड़े हो जाते हैं।

बढ़ती मोबाइल लत को लेकर अब देश के शीर्ष स्तर से चेतावनी दी जा रही है। छोटे बच्चे हों या किशोर, मोबाइल फोन अब केवल एक गैजेट नहीं बल्कि उनके व्यवहार, पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला उपकरण बन गया है। उत्तराखंड के शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने बताया कि इस पर कड़ा कदम उठाने की जरूरत है और राज्य सरकार अब स्कूलों में जागरूकता फैलाने के लिए एसओपी लागू करने जा रही है। शिक्षा मंत्री का कहना हैं कि आजकल छोटे बच्चे रोते हैं तो माता-पिता उन्हें चुप कराने के लिए मोबाइल पकड़ा देते हैं, जिससे ये आदत बाद में लत बन जाती है। कई विकसित देशों ने पहले ही बच्चों के मोबाइल उपयोग को लेकर मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू की है।

अब उत्तराखंड भी उसी दिशा में कदम बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री ने हाल ही में हुई शिक्षा मंत्रियों की बैठक में घर में ‘नो मोबाइल जोन’ बनाने की बात कही। उन्होंने सभी मंत्रियों से आग्रह किया कि बच्चों को मोबाइल के दुष्प्रभावों के बारे में समझाया जाए और इसकी सीमित उपयोग की संस्कृति विकसित की जाए। छात्र जब पढ़ाई शुरू करते हैं, तो मैसेज, गेम और सोशल मीडिया के नोटिफिकेशन से ध्यान भटकता है। सोने से पहले मोबाइल देखने की आदत से नींद की गुणवत्ता खराब होती है, जिससे अगले दिन कक्षा में ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाता है। मोबाइल से जुड़ी अत्यधिक निर्भरता के कारण कुछ छात्र यदि फोन उपयोग न कर पाएं तो चिड़चिड़े, तनावग्रस्त या बेचैन हो जाते हैं। बच्चे वास्तविक संवाद से कटकर वर्चुअल दुनिया में समय बिताने लगते हैं, जिससे उनमें आत्मीयता, सहानुभूति और सामूहिकता की भावना कम हो जाती है।

 

 

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