पौड़ी से शुरू होगी उत्तराखंड की पहली किनोवा खेती, किसानों की आय बढ़ाने की नई पहल
उत्तराखंड: बदलती जलवायु, अनियमित वर्षा और सिंचाई के सीमित संसाधनों के बीच उत्तराखंड में खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने नई पहल शुरू की है। ग्राम्य विकास विभाग पहली बार प्रदेश में किनोवा (Quinoa) की खेती का पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहा है। यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो आने वाले समय में पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों को पारंपरिक खेती के साथ एक ऐसी नकदी फसल का विकल्प मिलेगा, जो कम पानी में बेहतर उत्पादन देने के साथ अच्छी आमदनी का माध्यम भी बन सकती है। सरकार का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसी फसलों को बढ़ावा देना आवश्यक है, जो कम लागत, सीमित सिंचाई और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी सफलतापूर्वक उगाई जा सकें। किनोवा इन्हीं विशेषताओं के कारण दुनिया भर में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।
100 एकड़ में शुरू होगा पायलट प्रोजेक्ट
ग्राम्य विकास विभाग ने शुरुआती चरण में लगभग 100 एकड़ भूमि पर किनोवा की खेती का पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने का निर्णय लिया है। इसके लिए पौड़ी गढ़वाल जिले के थलीसैंण क्षेत्र का चयन किया गया है। इस क्षेत्र की जलवायु और ऊंचाई को किनोवा की खेती के लिए उपयुक्त माना गया है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार, परियोजना के दौरान फसल के उत्पादन, गुणवत्ता, बाजार संभावनाओं और किसानों को होने वाले आर्थिक लाभ का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा। यदि परिणाम सकारात्मक रहे तो भविष्य में इस खेती का विस्तार अन्य पर्वतीय जिलों तक भी किया जाएगा।
बाहर से मंगाए गए प्रमाणित बीज
पायलट प्रोजेक्ट के लिए फिलहाल प्रमाणित किनोवा बीज अन्य राज्यों से मंगाए गए हैं। इन्हीं बीजों से पहली फसल तैयार की जाएगी। भविष्य की योजना राज्य में ही किनोवा का सीड बैंक विकसित करने की है, ताकि किसानों को स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण बीज आसानी से उपलब्ध हो सकें। ग्राम्य विकास विभाग पहले से ही मोटे अनाज (मिलेट्स) के लिए बीज संरक्षण और सीड बैंक की दिशा में कार्य कर रहा है। अब उसी पहल में किनोवा को भी शामिल करने की तैयारी है।
ग्राम्य विकास विभाग का मानना है कि किनोवा की खेती किसानों के लिए अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकती है। कम पानी और कम रखरखाव वाली यह फसल उन क्षेत्रों में भी अच्छी पैदावार दे सकती है, जहां पारंपरिक खेती मौसम की मार झेल रही है। विभाग के अनुसार यदि पायलट परियोजना सफल रहती है तो किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण, गुणवत्तापूर्ण बीज और विपणन सहायता उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि वे व्यावसायिक स्तर पर इसकी खेती कर सकें।
क्या है किनोवा और क्यों बढ़ रही इसकी मांग?
किनोवा दक्षिण अमेरिका के एंडीज पर्वतीय क्षेत्र, विशेषकर पेरू और बोलिविया की पारंपरिक फसल है। हालांकि इसे सामान्य भाषा में अनाज कहा जाता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह छद्म-अनाज (Pseudo Cereal) की श्रेणी में आता है। पिछले कुछ वर्षों में इसे ‘सुपरफूड’ के रूप में वैश्विक पहचान मिली है। इसका कारण इसका उच्च पोषण मूल्य है। किनोवा में लगभग 14 से 16 प्रतिशत तक प्रोटीन पाया जाता है और इसमें मानव शरीर के लिए आवश्यक सभी नौ आवश्यक अमीनो एसिड मौजूद होते हैं। इसके अलावा इसमें फाइबर, आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, जिंक और एंटीऑक्सीडेंट भी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। ग्लूटेन-फ्री होने के कारण स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों, खिलाड़ियों और मधुमेह रोगियों के बीच भी इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है।
उत्तराखंड की जलवायु के लिए उपयुक्त
विशेषज्ञों के अनुसार किनोवा की खेती समुद्र तल से लगभग 1,000 से 3,500 मीटर की ऊंचाई तक सफलतापूर्वक की जा सकती है। उत्तराखंड के अधिकांश पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां इस फसल के लिए अनुकूल मानी जाती हैं। इस फसल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे अपेक्षाकृत कम सिंचाई की आवश्यकता होती है। साथ ही इसमें कीट एवं रोगों का प्रकोप भी कम देखा जाता है, जिससे किसानों की लागत घटती है और उत्पादन अपेक्षाकृत अधिक लाभकारी बनता है। जहां उत्तराखंड के कई पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक फसलें वर्ष में केवल एक बार ली जाती हैं, वहीं अनुकूल परिस्थितियों में किनोवा की खेती साल में दो से तीन बार तक की जा सकती है। हालांकि यह स्थानीय मौसम, तापमान और सिंचाई की उपलब्धता पर निर्भर करेगा। यदि किसानों को बेहतर तकनीकी मार्गदर्शन और बाजार उपलब्ध कराया जाए तो यह फसल नियमित आय का मजबूत माध्यम बन सकती है।
बाजार में अच्छी कीमत मिलने की उम्मीद
देश में स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग के कारण किनोवा का बाजार लगातार विस्तार कर रहा है। वर्तमान में इसकी थोक कीमत गुणवत्ता के आधार पर लगभग 80 से 150 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच सकती है, जबकि ऑर्गेनिक और प्रीमियम गुणवत्ता वाले किनोवा की कीमत 200 से 300 रुपये प्रति किलोग्राम या उससे अधिक भी मिल सकती है। प्रोसेसिंग और ब्रांडिंग के बाद इसका मूल्य और बढ़ जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन शुरू होता है तो किसानों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बनाने का अवसर मिलेगा। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते जलवायु परिदृश्य में केवल पारंपरिक खेती पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। कम पानी, बेहतर पोषण और अधिक बाजार मूल्य वाली फसलों को अपनाना समय की आवश्यकता है। प्रगतिशील किसानों ने भी सरकार की इस पहल का स्वागत किया है। उनका कहना है कि यदि किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज, वैज्ञानिक प्रशिक्षण और विपणन की बेहतर व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए तो किनोवा पर्वतीय क्षेत्रों की कृषि व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकता है। इससे किसानों की आय बढ़ने के साथ-साथ युवाओं का खेती के प्रति आकर्षण भी बढ़ेगा।
थलीसैंण परियोजना की सफलता पर टिकी उम्मीदें
सरकार की यह पहल फिलहाल पायलट स्तर पर शुरू की जा रही है, लेकिन इसकी सफलता उत्तराखंड की कृषि नीति के लिए निर्णायक साबित हो सकती है। यदि थलीसैंण में शुरू होने वाला यह प्रयोग सफल रहता है तो आने वाले वर्षों में किनोवा की खेती को राज्य के अन्य पर्वतीय जिलों तक विस्तारित किया जाएगा। इससे कृषि विविधीकरण को बढ़ावा मिलेगा, किसानों की आय बढ़ेगी और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच उत्तराखंड की खेती को नई दिशा मिल सकती है।

