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उत्तराखंड की प्रारंभिक शिक्षा में बड़ा बदलाव, कक्षा 5 तक पंचकोष मॉडल..

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2026-02-03
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उत्तराखंड की प्रारंभिक शिक्षा में बड़ा बदलाव, कक्षा 5 तक पंचकोष मॉडल..

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड में प्रारंभिक शिक्षा को अधिक समग्र, व्यावहारिक और बाल-केंद्रित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) ने कक्षा पांचवीं तक के बच्चों की राज्य पाठ्यचर्या में पंचकोष विकास सिद्धांत को शामिल करने की अनुशंसा की है। यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP-2020) के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य तीन से आठ वर्ष की आयु के बच्चों का सर्वांगीण और संतुलित विकास सुनिश्चित करना है। नई पाठ्यचर्या व्यवस्था के तहत अब शिक्षा का केंद्र रटंत विद्या नहीं, बल्कि अनुभवात्मक, गतिविधि-आधारित और खेल-खेल में सीखने की प्रक्रिया होगी। इससे बच्चों पर पढ़ाई का बोझ कम होगा और वे सीखने को एक स्वाभाविक, आनंददायक अनुभव के रूप में अपनाएंगे।

राष्ट्रीय ढांचे के अनुरूप, स्थानीय परिवेश से जुड़ी पाठ्यचर्या

SCERT द्वारा तैयार की गई बुनियादी स्तर (फाउंडेशन स्टेज) की राज्य पाठ्यचर्या रूपरेखा (SCF) को राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा के मार्गदर्शन में विकसित किया गया है। इस पाठ्यचर्या में उत्तराखंड की भाषाई, सांस्कृतिक और भौगोलिक विशेषताओं को विशेष रूप से शामिल किया गया है, ताकि शिक्षा बच्चों के आसपास के परिवेश से जुड़ी, व्यवहारिक और अर्थपूर्ण बन सके।यह पाठ्यचर्या विशेष रूप से तीन से आठ वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों के सीखने और विकास पर केंद्रित है, जिसमें शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक और नैतिक विकास को समान महत्व दिया गया है।

खेल-खेल में सीखने पर विशेष जोर

नई व्यवस्था में बच्चों की जिज्ञासा, कल्पनाशक्ति और रचनात्मक सोच को विकसित करने के लिए स्थानीय कहानियों, लोकसंस्कृति, पारंपरिक खेलों और दैनिक जीवन से जुड़े उदाहरणों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है। इसका उद्देश्य यह है कि बच्चे पढ़ाई को बोझ नहीं, बल्कि आनंद और खोज के रूप में महसूस करें। SCERT के राज्य समन्वयक रविदर्शन तोपाल ने बताया कि इस नई पाठ्यचर्या से बच्चों पर शैक्षणिक दबाव कम होगा और वे स्वाभाविक रूप से सीखने की प्रक्रिया से जुड़ सकेंगे। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में शिक्षकों के प्रशिक्षण, शिक्षण सामग्री और मूल्यांकन पद्धति में भी इसी दर्शन के अनुरूप व्यापक बदलाव किए जाएंगे। उन्होंने जानकारी दी कि उत्तराखंड में वर्तमान में 11,580 प्राथमिक विद्यालय संचालित हो रहे हैं, जिनमें तीन लाख से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। प्रस्तावित नई पाठ्यचर्या से इन सभी बच्चों को प्रत्यक्ष लाभ मिलने की उम्मीद है और राज्य में प्रारंभिक शिक्षा की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होगा। कुल मिलाकर, पंचकोष विकास सिद्धांत पर आधारित यह पहल उत्तराखंड में बाल-केंद्रित, आनंददायक और भविष्य उन्मुख शिक्षा व्यवस्था की नींव रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

क्या है पंचकोष विकास सिद्धांत..

पंचकोष विकास सिद्धांत भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित है, जिसमें बच्चे के विकास को पांच स्तरों में देखा गया है

अन्नमय कोष- शारीरिक विकास और पोषण पर जोर, ताकि स्वस्थ शरीर सीखने में सहायक बने।

प्राणमय कोष- स्वास्थ्य, स्वच्छता और जीवन शक्ति को मजबूत करने वाली गतिविधियां, जिससे सीखने की ऊर्जा बनी रहे।

मनोमय कोष- भावनात्मक संतुलन, आत्मविश्वास और सामाजिक कौशल का विकास, ताकि बच्चे समाज को समझ सकें।

विज्ञानमय कोष- तर्क, सोच-समझ और बौद्धिक क्षमता को मजबूत करना, जिससे आगे की पढ़ाई की ठोस नींव तैयार हो।

आनंदमय कोष- नैतिक मूल्यों, आत्मिक सुख और सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास, ताकि बच्चे राष्ट्र, परिवार और समाज के प्रति सम्मान की भावना के साथ आगे बढ़ें।

विद्यालय स्तर तक पहुंचाना होगी बड़ी जिम्मेदारी..

राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) की निदेशक बंदना गर्ब्याल ने कहा है कि राज्य पाठ्यचर्या में किए गए नवाचारों और अनुशंसाओं को विद्यालय स्तर तक प्रभावी ढंग से लागू करने की जिम्मेदारी फील्ड में कार्यरत अधिकारियों की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल पाठ्यचर्या तैयार करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे कक्षा-कक्ष तक सही तरीके से पहुंचाना और व्यवहार में उतारना सबसे अहम चुनौती है। उन्होंने कहा कि इसके लिए शिक्षकों, अभिभावकों और समाज के विभिन्न वर्गों के साथ निरंतर संवाद और समन्वय आवश्यक है। सामूहिक प्रयासों से ही एक ऐसा शैक्षिक वातावरण तैयार किया जा सकता है, जो बच्चों के सर्वांगीण विकास को मजबूती दे सके। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पंचकोष विकास सिद्धांत को प्रभावी रूप से लागू किया जाता है, तो उत्तराखंड में प्रारंभिक शिक्षा की दिशा और दशा में गुणात्मक परिवर्तन देखने को मिलेगा। इस सिद्धांत के तहत बच्चों के बौद्धिक विकास के साथ-साथ उनके मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक और नैतिक पक्षों को भी समान महत्व दिया जाएगा।

 

 

 

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