29 मार्च से 2 अप्रैल तक बंद रहेगी पाताल भुवनेश्वर गुफा, नहीं होगी एंट्री..
उत्तराखंड: विश्व प्रसिद्ध पाताल भुवनेश्वर गुफा में लंबे समय से लंबित सुधार कार्य अब शुरू होने जा रहा है। गुफा के भीतर आवागमन को सुरक्षित और सुगम बनाने के उद्देश्य से सीढ़ियों के नवनिर्माण का कार्य किया जाएगा। इसके चलते 29 मार्च से 2 अप्रैल 2026 तक गुफा को श्रद्धालुओं के लिए पूरी तरह बंद रखने का निर्णय लिया गया है। इस अवधि में किसी भी यात्री को गुफा के भीतर प्रवेश की अनुमति नहीं होगी। 3 अप्रैल से गुफा के कपाट पुनः दर्शन के लिए खोल दिए जाएंगे। मंदिर समिति के अनुसार यह निर्णय श्रद्धालुओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। गुफा के भीतर जाने का रास्ता काफी संकरा और चुनौतीपूर्ण है, जहां पुराने समय में बनी सीढ़ियां अब जर्जर हो चुकी हैं। ऐसे में नई और सुरक्षित सीढ़ियों का निर्माण आवश्यक माना गया, ताकि भविष्य में आने वाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा या जोखिम का सामना न करना पड़े।
यह कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के दिशा-निर्देशों के तहत किया जा रहा है। संबंधित अधिकारियों द्वारा गुफा के भीतर संकरे मार्गों पर आधुनिक तकनीक से नई सीढ़ियां तैयार की जाएंगी। निर्माण कार्य के दौरान सुरक्षा मानकों का विशेष ध्यान रखा जाएगा। मंदिर समिति के अध्यक्ष नीलम भंडारी और महासचिव जगत रावल ने बताया कि हर वर्ष हजारों की संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। गुफा के भीतर प्रवेश मार्ग अत्यंत संकरा होने के कारण कई बार कठिनाई का सामना करना पड़ता है, जिसे देखते हुए यह सुधार कार्य बेहद जरूरी हो गया था।
उन्होंने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे 29 मार्च से 2 अप्रैल के बीच अपनी यात्रा की योजना न बनाएं और निर्धारित तिथियों के बाद ही दर्शन के लिए आएं। 3 अप्रैल 2026 से सुबह के समय से ही गुफा को पूर्व की तरह खोल दिया जाएगा। बता दे कि इससे पहले भी बरसात के मौसम में गुफा के भीतर ऑक्सीजन की कमी और सुरक्षा कारणों से कुछ समय के लिए इसे बंद रखा गया था। अब स्थायी सुधार के तहत सीढ़ियों के नवनिर्माण का कार्य किया जा रहा है, जिससे भविष्य में दर्शन व्यवस्था और अधिक सुरक्षित और व्यवस्थित हो सकेगी।
पाताल भुवनेश्वर गुफा का महत्व..
पाताल भुवनेश्वर गुफा उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की गंगोलीहाट तहसील में स्थित एक प्राचीन और धार्मिक स्थल है। इसे चारों युगों का प्रतीक माना जाता है और इसकी धार्मिक मान्यता बेहद गहरी है। मान्यता है कि यहां भगवान गणेश का कटा हुआ सिर गिरा था। गुफा के भीतर प्रवेश करने के लिए बेहद संकरे (लगभग 3 से 4 फीट) मार्ग से होकर गुजरना पड़ता है, जहां नीचे उतरने के लिए पत्थरों का सहारा लिया जाता है।धार्मिक ग्रंथों में भी इस गुफा का उल्लेख मिलता है। स्कंद पुराण के ‘मानस खंड’ में इसका वर्णन किया गया है, जिससे इसकी पौराणिक महत्ता और भी बढ़ जाती है। प्रशासन और मंदिर समिति का मानना है कि वर्तमान सुधार कार्य के बाद यह स्थल श्रद्धालुओं के लिए पहले से अधिक सुरक्षित और सुगम बन जाएगा।

