उत्तराखंड में शिक्षकों को मिल सकता है ट्रैवल लीव, दो दिन के यात्रा अवकाश पर शासन में प्रस्ताव..
उत्तराखंड: उत्तराखंड में लंबे समय से लंबित एक महत्वपूर्ण मांग अब पूरी होने की ओर बढ़ती नजर आ रही है। राज्य में कार्यरत शिक्षकों को अपने गृह जनपद तक आने-जाने के लिए विशेष यात्रा अवकाश (ट्रैवल लीव) देने की दिशा में सरकार ने कदम बढ़ाए हैं। माध्यमिक शिक्षा निदेशक डॉ. मुकुल कुमार सती ने इस संबंध में विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेज दिया है, जिसमें शिक्षकों को साल में एक बार आकस्मिक अवकाश के साथ अतिरिक्त दो दिन का यात्रा अवकाश देने की सिफारिश की गई है।
यह मुद्दा लंबे समय से शिक्षक संगठनों द्वारा उठाया जाता रहा है। बता दे कि उत्तराखंड बनने से पहले संयुक्त उत्तर प्रदेश में पर्वतीय क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षकों और कर्मचारियों को अपने घर जाने के लिए विशेष यात्रा अवकाश की सुविधा मिलती थी। लेकिन राज्य गठन के बाद इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया, जिससे दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षकों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियां इस समस्या को और जटिल बनाती हैं। कई शिक्षकों के कार्यस्थल उनके गृह जनपद से 500 से 600 किलोमीटर या उससे अधिक दूरी पर स्थित हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में सीमित परिवहन सुविधा, लंबा यात्रा समय और कठिन मार्गों के कारण शिक्षकों को अपने घर पहुंचने में एक से अधिक दिन लग जाते हैं। ऐसे में उनके 14 दिन के आकस्मिक अवकाश का बड़ा हिस्सा केवल यात्रा में ही खर्च हो जाता है, जिससे वे परिवार के साथ पर्याप्त समय नहीं बिता पाते।
माध्यमिक शिक्षा विभाग ने अपने प्रस्ताव में इन्हीं व्यावहारिक समस्याओं को प्रमुख आधार बनाया है। इसमें कहा गया है कि शिक्षकों को कैलेंडर वर्ष में एक बार गृह जनपद आने-जाने के लिए आकस्मिक अवकाश के साथ अतिरिक्त यात्रा अवधि प्रदान करना न्यायसंगत और आवश्यक है। इससे न केवल शिक्षकों की व्यक्तिगत परेशानियां कम होंगी, बल्कि उनका मानसिक संतुलन और कार्यक्षमता भी बेहतर होगी। इस मामले पर शासन स्तर पर भी सकारात्मक रुख देखने को मिला है। 16 जनवरी 2026 को वित्त विभाग और शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच हुई बैठक में इस प्रस्ताव पर सहमति बनी थी। बैठक में वित्त सचिव दिलीप जावलकर समेत अन्य अधिकारियों ने इस व्यवस्था को व्यवहारिक और आवश्यक बताते हुए प्रस्ताव को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई थी।
राजकीय शिक्षक संघ भी लंबे समय से इस मांग को उठा रहा था और हाल ही में विभागीय अधिकारियों के साथ हुई वार्ता के बाद इस पर ठोस पहल संभव हो सकी है। यदि शासन इस प्रस्ताव को मंजूरी देता है, तो राज्य के हजारों शिक्षकों को सीधा लाभ मिलेगा, खासकर उन शिक्षकों को जो दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में तैनात हैं। कुल मिलाकर यह पहल न केवल शिक्षकों के जीवन को आसान बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है, बल्कि इससे शिक्षा व्यवस्था में भी सकारात्मक प्रभाव पड़ने की उम्मीद है, क्योंकि संतुष्ट और मानसिक रूप से सशक्त शिक्षक ही बेहतर शिक्षा प्रदान कर सकते हैं।

