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महिलाओं को मिला रोजगार का नया माध्यम हथकरघा उद्योग.

क्यों है उत्तराखण्ड में हथकरघा उद्योग का महत्व?

Admin by Admin
2023-08-07
in उत्तराखंड, कुमाऊँ, गढ़वाल
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महिलाओं को मिला रोजगार का नया माध्यम हथकरघा उद्योग.
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उत्तराखंड –

हर साल 7 अगस्त का दिन भारत में राष्ट्रीय हथकरघा,हैंडलूम दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का साफ मकसद है हैंडलूम बनाने वाले कारीगरों को बढ़ावा देना देश में हथकरघा उद्योग को सशक्त बनाने और दुनियाभर में हैंडलूम की पहचान बनाने के मकसद से हर साल 7 अगस्त का दिन भारत में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के रूप में मनाया जाता है। हैंडलूम हमारे भारत की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा है । पहवाने से लेकर घर की सजावट तक में हैंडलूम को अब खासतौर से शामिल किया जाने लगा है जिससे इस इंडस्ट्री में रोजगार बढ़ा है और कारीगरों की स्थिति भी सुधर रही है।

उत्तराखण्ड के सम्बन्ध में हथकरघा उद्योग का बहुत अधिक महत्व है यहां के सीमांत गांवों के हजारों परिवारों का जीवन स्तर सुधारने और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में हथकरघा उद्योग सहायक साबित हो रहा है। उत्तराखंड हथकरघा एवं हस्तशिल्प विकास परिषद के अनुसार 31 मार्च तक प्रदेश के 11 हजार 96 परिवार हथकरघा उद्योग से जुड़े थे। इनमें सबसे अधिक आठ हजार 717 परिवार ऊधमसिंह नगर जिले के हैं,जबकि टिहरी से सबसे कम 48 परिवार इस विधा से जुड़े हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य में हस्तशिल्प और हथकरघा का सालाना कारोबार तकरीबन 50 करोड़ रुपये का है।राज्य सरकार ने पिछले चार साल में ग्रामीणों को हथकरघा उद्योग से जोड़ने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। जिनका सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहा है। ग्रामीण फिर इस उद्योग जुड़ने लगे हैं। प्रदेश के बुनकरों को स्वावलंबी बनाने और हथकरघा उद्योग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सरकार खुद बुनकरों से उनके उत्पाद खरीद रही है। जिन्हें ष्हिमाद्रिष् के नाम से देश.विदेश में उपलब्ध कराया जा रहा है।

इन उत्पादों की भारी मांग

राज्य के हथकरघा उत्पादों की देश ही नहीं विदेशों में भी अपनी विशेष पहचान है। यहां की बनी रिंगाल की टोकरी, कंडी, भेड़ की ऊन से बनी शॉल, पंखी, दुपट्टा, जूट से बने कारपेट,भीमल के नेचुरल फाइबर से बने विभिन्न प्रकार के उत्पादों की भारी मांग है।

 

राज्य में हथकरघा उद्योग को प्रोत्साहित करने के लिए उद्योग निदेशालय ने वर्ष 2018 में नंदा देवी सोसायटी व हंस फाउंडेशन के गठजोड़ से अल्मोड़ा में नंदा देवी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का गठन किया था। इसकी मदद से अल्मोड़ा में महिला बुनकरों को रोजगार मिला हुआ है, जो कोरोनाकाल में भी घरों में हथकरघा कार्यो से जुड़ी रहीं।

क्यों मनाया जाता है हथकरघा दिवस

देश में सात अगस्त 1905 को स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ था। इसी को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2015 में केंद्र सरकार ने हथकरघा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए सात अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाने की शुरुआत की। इस अवसर पर आज पटेलनगर स्थित उद्योग निदेशालय राष्ट्रीय वेबिनार के माध्यम से अल्मोड़ा, ऊधमसिंह नगर और देहरादून के बुनकरों से संवाद स्थापित करेगा।

उत्तराखंड में कंडाली यानी बिच्छू घास (नेटल) और भांग (इंडस्ट्रियल हेम्प) के रेशों से तैयार उत्तराखंड के हथकरघा उत्पाद देश-दुनिया में छाए हुए हैं। इन प्राकृतिक रेशों से बने वास्कट, स्टॉल, मफलर की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बढ़ रही है। राज्य में हैंडलूम उत्पादों का सालाना 50 करोड़ का कारोबार होता है, और 12500 बुनकर हथकरघा उद्योग से जुड़े हैं।

हाथ से बुनाई की परंपरा उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत बनी हुई है। तकनीकी और मशीनी युग में भी राज्य के कई बुनकर परिवारों ने हथकरघा उद्योग को जीवित रखा है। उत्तरकाशी जिले के मोरी, पुरोला, डुंडा, टिहरी के ढालवाला, रानीचौरी, चमोली के छिनका, घिंघराण, मंगरोली, अल्मोड़ा के मटेना, दीनापानी, बाकेश्वर के धर्मधर, पिथौरागढ़ के मुनस्यारी, धारचूला, डीडीहाट, ऊधमसिंह नगर के जसपुर, काशीपुर, हरिद्वार के मंगलौर, देहरादून के कालसी, शेरपुर जैसे कई जिलों में बुनकरी का काम किया जा रहा है।

चमोली जिले के मंगरौली में नेटल फाइबर कार्डिंग प्लांट स्थापित है जहाँ कई महिला बुनकर कंडाली के रेशों से वास्कट (जैकेट), स्टॉल और मफलर तैयार कर रही हैं। इसके अलावा, टिहरी जिले के ढालवाला में भांग के फैब्रिक से बैग और अन्य उत्पाद बनाए जा रहे हैं।

उत्तराखंड में हथकरघा उत्पादन से महिलाओं को रोजगार का एक नया माध्यम मिला है। यहाँ के बुनकरों ने भेड़ की ऊन से शॉल, पंखी, दुपट्टा और अंगूरा शॉल तैयार करके अपनी एक पहचान बनाई है। प्रदेश सरकार ने हरकरघा उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए हिमाद्रि ब्रांड की मार्केटिंग की भी योजना बनाई है।

उत्तराखंड में बुनकरों के लिए वित्तीय सुरक्षा की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं। प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना के तहत हथकरघा बुनकरों का बीमा किया गया है। इसके अंतर्गत बुनकरों के परिवार को बीमा राशि मिलेगी जो मृत्यु के मामले में उपयोग आएगी।

उत्तराखंड के बुनकरों ने अपनी सांस्कृतिक धरोहर को मजबूती से जीवित रखकर, और महिलाओं को रोजगार के नए अवसर प्रदान करके प्रदेश की तरक्की में योगदान किया है।

Tags: #uttarakhandnews#hindinewsofuttarakhand
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