उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, आउटसोर्स कर्मचारियों से फिलहाल नहीं होगी प्रोत्साहन राशि की वसूली..
उत्तराखंड: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने प्रदेश के विभिन्न सरकारी विभागों में उपनल और अन्य आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से कार्यरत कर्मचारियों से जुड़ी महत्वपूर्ण याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि जब तक संबंधित अधिकारियों द्वारा कर्मचारियों के प्रत्यावेदन पर विधिसम्मत निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक उनसे किसी प्रकार की प्रोत्साहन राशि की रिकवरी नहीं की जाएगी। मामले की सुनवाई वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ में हुई। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने राज्य सरकार की ओर से कर्मचारियों को अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित करने तथा पूर्व में दी गई प्रोत्साहन राशि की वसूली की प्रक्रिया पर गंभीरता से विचार किया। इसके बाद अदालत ने संबंधित विभाग को कर्मचारियों के पक्ष पर नियमानुसार निर्णय लेने के निर्देश जारी किए।
हाईकोर्ट ने आदेश में कहा कि प्रभावित कर्मचारी 10 दिनों के भीतर अपना विस्तृत प्रत्यावेदन संबंधित विभाग को प्रस्तुत करें। इसके बाद राजाजी टाइगर रिजर्व (पूर्व में राजाजी नेशनल पार्क) के निदेशक को निर्देशित किया गया है कि प्राप्त प्रत्यावेदनों पर सभी तथ्यों और नियमों का परीक्षण करते हुए निर्धारित अवधि के भीतर विधि के अनुसार निर्णय लिया जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक इन प्रत्यावेदनों पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक किसी भी कर्मचारी से प्रोत्साहन राशि की रिकवरी नहीं की जाएगी। न्यायालय ने कर्मचारियों की इस मांग को स्वीकार करते हुए संबंधित याचिकाओं का निस्तारण कर दिया। याचिकाकर्ताओं में राजाजी टाइगर रिजर्व में कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटर पंकज, मोहित सहित कई अन्य कर्मचारी शामिल हैं। कर्मचारियों का कहना है कि उत्तराखंड राज्य गठन के बाद विभिन्न सरकारी विभागों में सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए उनकी नियुक्तियां अलग-अलग समय पर बाह्य एजेंसियों के माध्यम से की गई थीं। उनका दावा है कि वर्ष 2014 और 2016 में विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से नियुक्ति मिलने के बाद लगातार सेवा विस्तार दिया जाता रहा। बाद में वर्ष 2019 से उन्हें उपनल व्यवस्था के अंतर्गत कार्यरत माना गया और तब से वे लगातार विभाग में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार लंबे समय तक उपनल कर्मचारियों की तरह कार्य करने और समान सुविधाएं प्राप्त करने के बावजूद अब राज्य सरकार उन्हें यह कहकर अलग श्रेणी में रख रही है कि उनकी मूल नियुक्ति उपनल के माध्यम से नहीं बल्कि अन्य आउटसोर्सिंग एजेंसियों से हुई थी। इसी आधार पर पूर्व में दी गई प्रोत्साहन राशि की रिकवरी की प्रक्रिया शुरू कर दी गई, जिसका कर्मचारियों ने विरोध किया। उनका कहना था कि विभाग ने वर्षों तक उनकी सेवाएं लीं, उन्हें उपनल कर्मचारियों के समान लाभ दिए और अब कई वर्षों बाद उनसे राशि वापस मांगना न्यायसंगत नहीं है। मामले पर सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि कर्मचारियों को अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। इसी को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने पहले विभागीय स्तर पर प्रत्यावेदन के माध्यम से विवाद के समाधान की प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित अधिकारी कर्मचारियों के सभी दस्तावेजों, सेवा रिकॉर्ड और लागू नियमों का परीक्षण करने के बाद निष्पक्ष एवं विधिसम्मत निर्णय लें। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि निर्णय होने तक किसी कर्मचारी से प्रोत्साहन राशि की वसूली न की जाए।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब प्रभावित कर्मचारियों की नजर विभागीय कार्रवाई पर टिकी है। निर्धारित समय सीमा के भीतर सभी कर्मचारी अपना पक्ष विभाग के समक्ष रखेंगे, जिसके बाद संबंधित अधिकारी को नियमों के अनुरूप अंतिम निर्णय लेना होगा। यदि विभाग कर्मचारियों के पक्ष में निर्णय देता है तो न केवल प्रोत्साहन राशि की रिकवरी का विवाद समाप्त हो सकता है, बल्कि भविष्य में समान परिस्थितियों में कार्यरत अन्य आउटसोर्स और उपनल कर्मचारियों के मामलों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। वहीं यदि कर्मचारी विभागीय निर्णय से संतुष्ट नहीं होते हैं तो उनके पास पुनः न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का विकल्प भी खुला रहेगा।

