पहाड़ी भाषाओं को तकनीक से जोड़ने की पहल..
सीएम धामी ने लॉन्च किया वॉइस कलेक्शन पोर्टल..
उत्तराखंड: उत्तराखंड की स्थानीय भाषाओं और बोलियों को डिजिटल दुनिया से जोड़ने की दिशा में नई पहल शुरू की गई है। अब गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी जैसी क्षेत्रीय भाषाओं को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के माध्यम से तकनीकी मंच पर पहचान दिलाने की तैयारी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने कैंप कार्यालय में एआई स्ट्रैटेजिक इंजीनियरिंग (AiSE) फाउंडेशन की ‘भाषा AI’ पहल के तहत वॉइस कलेक्शन पोर्टल का शुभारंभ किया। इस अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री की कुमाऊंनी भाषा में रिकॉर्ड की गई आवाज के साथ हुई। पोर्टल के जरिए प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों से लोगों की आवाज, स्थानीय शब्दों और बोलने के विशिष्ट तरीकों से जुड़ा डिजिटल डेटा जुटाया जाएगा। इसका उद्देश्य भविष्य में AI आधारित तकनीकों को उत्तराखंड की क्षेत्रीय भाषाओं और उनके अलग-अलग उच्चारणों को समझने में सक्षम बनाना है।
स्थानीय बोलियों को मिलेगी डिजिटल पहचान
वर्तमान में कई डिजिटल प्लेटफॉर्म हिंदी और अंग्रेजी जैसी भाषाओं में बेहतर तरीके से काम करते हैं, लेकिन क्षेत्रीय बोलियों को समझने और उनमें जवाब देने की क्षमता सीमित है। ‘भाषा AI’ पहल इसी अंतर को कम करने के उद्देश्य से शुरू की गई है। पोर्टल के माध्यम से गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी बोलने वाले लोग अपनी आवाज और भाषा से जुड़ी जानकारी उपलब्ध करा सकेंगे। इससे इन भाषाओं का डिजिटल संग्रह तैयार करने में मदद मिलेगी। भविष्य में इस डेटा का उपयोग ऐसे AI टूल विकसित करने में किया जा सकता है, जो स्थानीय बोलियों को समझने और उनमें संवाद करने में सक्षम हों। उत्तराखंड में एक ही भाषा के शब्दों और उच्चारण में क्षेत्र के अनुसार अंतर देखने को मिलता है। ऐसे में विभिन्न इलाकों से जुटाया गया वॉइस डेटा AI सिस्टम को भाषाई विविधता समझने में मदद कर सकता है।
अपनी भाषा में मिल सकेगी सरकारी योजनाओं की जानकारी
सीएम पुष्कर सिंह धामी ने इस पहल को स्थानीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि प्रदेश की लोकभाषाएं यहां की सांस्कृतिक पहचान हैं और इन्हें सुरक्षित रखने के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग जरूरी है। सीएम ने इस बात पर भी जोर दिया कि AI के माध्यम से दूरस्थ और सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक उनकी अपनी भाषा में सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाने की संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं। इससे स्थानीय नागरिकों के लिए सरकारी सेवाओं को समझना और अपनी समस्याएं संबंधित विभागों तक पहुंचाना आसान हो सकता है। हालांकि, इस तरह की सुविधाओं को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए स्थानीय भाषाओं के पर्याप्त डेटा और तकनीकी विकास की जरूरत होगी। ‘भाषा AI’ पोर्टल को इसी दिशा में शुरुआती कदम के रूप में देखा जा रहा है।
लोकसंस्कृति के संरक्षण में भी मिलेगी मदद
कार्यक्रम में प्रसिद्ध लोकगायक और पद्मश्री सम्मानित प्रीतम भरतवाण भी मौजूद रहे। उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण में इस पहल की उपयोगिता पर जोर दिया। गढ़वाली और अन्य स्थानीय बोलियों में मौजूद जागर, लोकगीतों और पारंपरिक सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों का संरक्षण भी इस दिशा में अहम माना जा रहा है। प्रीतम भरतवाण ने बताया कि जागर अकादमी स्थानीय बोलियों के सही उच्चारण और उनकी मौलिकता को बनाए रखने के लिए अभियान में सहयोग करेगी। इससे भाषा से जुड़े डिजिटल डेटा को अधिक प्रामाणिक बनाने में मदद मिल सकती है। कार्यक्रम में AiSE फाउंडेशन के संस्थापक सचिदानंद सेमवाल और उनकी टीम सहित कई अन्य लोग भी उपस्थित रहे। इस पहल के जरिए उत्तराखंड की भाषाई विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ने और उसे डिजिटल माध्यमों पर सहेजने का प्रयास किया जा रहा है। स्थानीय भाषाओं को AI से जोड़ने की यह पहल आने वाले समय में शिक्षा, डिजिटल सेवाओं और सांस्कृतिक संरक्षण के नए अवसर खोल सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि पोर्टल पर कितना उपयोगी भाषाई डेटा जुटाया जाता है और उसके आधार पर तकनीक को किस स्तर तक विकसित किया जा पाता है।
